वही करो जो मन को शकुन दे

किसी को ख़ुश करने के लिये काम मत करो
किसी को दुखी करने के लिए काम मत करो
काम बस वही करो जो सत्य और सुंदर हो और आपके दिल को सुकून दे ।
बस अपनी मौज में काम करो, अपनी मौज में जियो।

ज़िंदगी के किताब से

दूसरों को सुधारने की चाहत

इंसान अपनी निजी ज़िन्दगी में हमेशा इक अच्छे और ईमानदार मित्र की चाहत रखता है और जाने अनजाने में इसकी तलाश भी करता रहता। इसलिये इसे मैं इंसान की सहज चाहत और व्यवहार मानता हूँ। पर इसके साथ एक सर्वमान्य व्यवहार यह भी देखा जाता है की हम प्रायः इस बात के लिये जनमत नहीं उठाते की हम कितने सच्चे और अच्छे इंसान है ? इस बात में कोई बुराई नहीं है की हम सच्चे और अच्छे मित्र चाहते है पर क्या हमें इस बात की की तसल्ली नहीं करनी चाहिये की हमें भी सच्चा और ईमानदार होना चाहिए?

हमारी प्रत्यशा सिर्फ़ दूसरों से रहती है की लोगों को ऐसा रहना चाहिए, लोगों को वैसा करना चाहिये लोगों को ऐसा नहीं करना चाहिये। इस बात को हम दूसरे तरीक़े से कह सकते है की लोग ज़्यादातर दूसरों को सुधारना चाहते है, अपने में सुधार करना नहीं चाहते क्योंकि अक्सर उन्हें यह लगता है की मैं तो ठीक हूँ सब गड़बड़ी दूसरों के वजह से हो रही है, इसलिए दूसरो को सुधारना चाहिए और इसके लिए कई प्रकार का प्रयास भी लोग करते है। और इसी वह से सारा संघर्ष और वैमनस्य चारों तरफ़ फैलता है और संघर्ष पैदा होता है ।

हम अपने नियति के निर्माता है

a6bcf109-87a3-4d58-a996-fe5715960c26-e1516806961573.jpegमेरी अपनी मान्यता है कि इंसान अपने सोच और यक़ीन के अनुसार ही साधारण और असाधारण बनता है । जैसे ही बच्चा इस धरती पर आता है वह नई नई चीज़ें देखता है और उसके साथ छोटी बड़ी घटनाएँ होती रहती है। ये घटनाएँ अच्छी भी होती है और बुरी भी होती है । ये सभी घटनाएँ उसके बाल मन के ऊपर एक छाप छोरती जाती है । यही छाप उस बच्चें के मन में धारणाओं का निर्माण करता है । यही धारणाएँ उसके जीवन में एक एक करके अच्छि या बुरी चीज़ों को आकर्षित करती रहती है और घटित करती रहती है ।जिसे आम तौर पर लोग नियति या भाग्य कहते हैं।

इस ब्लोगिंग साइट पर मैं उस बातों और घटनाओं का ज़िक्र करता हूँ कि कैसे अमुक घटना ने उसके सोचने और ज़िंदगी को देखने का नज़रिया बदल दीया और उसके वजह से उसके ज़िंदगी में कैसे बदलाव आ गया । इस ब्लॉग के माध्यम से मैं लोगों के बीच इस बात की चर्चा करना चाहता हूँ की हमारा भाग्य कोई ऊपर बैठा भगवान नहीं लिखता है बल्कि हम अपने आदतन सोच और व्यवहार के द्वारा हम अपने भाग्य का निर्माण करते है । हम ही अपने नियति के निर्माता है ।

पुरूषों की मानसिकता

सैकड़ों सालों से पुरुषों के द्वारा पत्नी को नाना प्रकार से शारीरिक और मानसिक रूप से प्रताड़ित किया जाता रहा है।सती प्रथा, बाल बिवाह, बहुविवाह, तलाक़ और जाने किस किस तरह से। इनमे से कईयों पर क़ानूनी रूप से रोक लगाया जा चुका है और कई अलग अलग रूपों में बदस्तूर जारी है। इसके तह में जाने पर पता चलता है की किस प्रकार से बच्चियों को सुरुआतसे ही अपने पति के साथ समझोता करने, पुरुष के ख़िलाफ़ आवाज़ न उठाने और अपना घर किसी भी तरह से बचाए रखने की सीख दी जाती है। साथ ही इन सब चीज़ों को त्याग, तपस्या और संयम एत्यादि के द्वारा महिमा मंडित भी करते रहे है । इसके साथ ही बच्चियों के मन में एक भय बिठाया जाता है की ऐसा नहीं करने पर उसे बहुत गम्भीर परिणाम ताउम्र भुगतना पड़ेगा।
वस्तुतः यह सारे रीति रिवाज पुरुषों के द्वारा अपने फ़ायदे के लिए बनाए गए है जिसके केंद्र में यह मानसिकता काम करती रही है की इस्त्रियाँ पुरुषों की इस्तेमाल की वस्तु है ।आज भी ऐसे लोगों की संख्या बहुतायत में है जो इसी मानसिकता में जीते है । स्त्री पुरुष की समानता की बातें चाहे हम कितनी ही कर ले पर जब समान अधिकार देने की बात आती है तब हम अलग अलग दलील देकर कन्नी काट जाते है । तीन तलाक़ बिल पास हो जाना निश्चय ही एक ऐतिहासिक फ़ैसला है और इस से लोगों के मन में अवश्य ही एक भय बनेगा, पर पुरुषों की शोषण की वृति इस से ख़त्म हो जाएगी ऐसा मैं क़तई नहीं मानता।
एक बात ज़रूर है की स्त्री पुरूष की समानता के लिए लड़ी जाने वाली लड़ाईं में अवश्य ही एक मील का पत्थर साबित होगा । इसके लिए उन तमाम संघर्षरत महिलाओं, स्वयं सेवी संस्थानो और प्रधान मंत्री श्री मोदी धन्यवाद और बढ़ायी के पात्र है ।

Naresh

प्रकृति सबों को समान स्वतंत्रता देती है

प्रकृति सबो को समान रूप से अपनी ज़िंदगी में चुनाव करने की स्वतंत्रता देती है, इस बावत किसी भी प्रकार की कोई पक्षपात नहीं होती है। पर हाँ, सही क्या है ग़लत क्या है इसकी समझ प्रकृति से नहीं मिलती है, इसकी समझ हमें रोज़ रोज़ सीखनी पड़ती है और उसे अपनी ज़िन्दगी में उतारनी पड़ती है। यही से लोगों की ज़िन्दगी में बड़ा फ़र्क़ पड़ना शुरू हो जाता है। सही मायने में हमारी ज़िन्दगी के लिए सही क्या है ग़लत क्या है इसकी सही समझ और बुद्धिमत्ता बहुत कम लोग विकसित कर पाते है और इसी वजह से बहुत कम लोग अपनी ज़िंदगी में असमान्य सफलताएँ और ऊँचाई हासिल कर पाते है । बाक़ी लोग अपनी चुनाव करने की छमता का ग़लत इस्तेमाल करके औसत और औसत से नीचे की सफलताएँ हासिल करते है और औसत और औसत से नीचे की ज़िंदगी जीते है, और उन लोगों में से अधिकांश अपने भाग्य, हालात और जाने किन किन चीज़ों को कोशते हुए अपनी ज़िंदगी गुज़ार देते है 

चुनौती ज़िन्दगी का हिस्सा है , इसमें महारत हासिल करें

ज़िन्दगी में चुनौतियों से हम भाग नहीं सकते इसलिए हमें चुनौतियों के साथ तालमेल बनाना सिखना होगा और इसी तालमेल के साथ आगे  बढ़ना सिखना होगा। जो इन चीज़ों  को जान जाते है और महारत हासिल कर लेते है वही महारथी बनते है ।