भारत की क़ानून व्यवस्था

कितना घोर अन्याय है एक लड़की के साथ ज़ुल्म हो जाता है, पुलिस FIR नहीं लेती । उलटे उसके पिता को केस ना करने के लिए मारपीटा जाता है और अत्याचार की ऐंतहा तब हो जाती है जब उसकी मौत हो जाती है तब कहीं जाकर प्रशासन की नींद खुलती है तब SIT का गठन होता हैं FIR दर्ज होता है तब मुख्य अभियुक्त को छोड़ कर दूसरे अभयुक्तों को गिरफ़्तार किया जाता है। सच में ग़रीबों और कमज़ोरों के लिए न्याय पाने के लिए कितने ज़ुल्म और सितम सहने परते हैं। जान भी चली जाती है और ताउम्र एक डर के ख़ौफ़नाक साये में जीना कितना दर्दनाक है इसका सहज ही अंदाज़ा लगाया जा सकता है। और उसपर तुर्रा ये की अभियुक्त हँसते हुए बेशर्मी की हद पार करते हुए मीडिया को इंटर्व्यू देता है जैसे कह रहा हो सारा देश मेरे ठेंगे पर है जिसे जो बन पढ़ता है वो कर ले। मैं तो ऐसा ही हूँ और ऐसा ही रहूँगा ।
और उसपर कुछ क़ानून के जानकार यह दलील देते हैं की कितने भी अपराधी छूट जायें पर एक निर्दोष को सज़ा नहीं होनी चाहिये। और, इसी तर्क के बहाने सालों साल, सालों साल क़ानूनी प्रक्रिया चलती रहती है। अपराधी ठोस साक्ष्य के अभाव मैं बरी हो जाता है या बेल पर बेल पाकर उस भक्त भोगी के जीवन को और नारकीय बना देता है। इसकी परिणती बहुतों बार भुक्तभोगी की आत्महत्या या हत्या के रूप मैं भी होती हैं। सच में देश की क़ानूनी प्रकिया को देखकर बड़ा कोफ़्त होता है और एक बहुत बड़ी बेवसी पूरे देश में छा जाती है। अपराधियों की जल्दी धर पकड़ ना हो पाना और सज़ा के लिए २०-२५ साल का समय लगना और उसके बाद भी अंतिम मुहर का न लगना लोगों के मन मैं क़ानून के सम्मान में बहुत कमी लाता है । और इसका नतीजा ये होता है की फिर सैकड़ों की संख्या में क़ानून को तोड़ने वाले पैदा होते जाते हैं और क़ानून की इज़्ज़त करने वालों को बे इज़्ज़त करने लागतें हैं। मैं अपने आपको एक अन्धेर नगरी की एक अन्धेरी गुफा में फँसा हुआ महसूस करता हूँ और आशा की किरण के लिये बुरी तरह से छटपटा हुआ महसूस करता हूँ , क्या हमारे और भी भारत वासी मेरी तरह हीं छटपटा रहें हैं?
नरेश

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