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पुरूषों की मानसिकता

सैकड़ों सालों से पुरुषों के द्वारा पत्नी को नाना प्रकार से शारीरिक और मानसिक रूप से प्रताड़ित किया जाता रहा है।सती प्रथा, बाल बिवाह, बहुविवाह, तलाक़ और जाने किस किस तरह से। इनमे से कईयों पर क़ानूनी रूप से रोक लगाया जा चुका है और कई अलग अलग रूपों में बदस्तूर जारी है। इसके तह में जाने पर पता चलता है की किस प्रकार से बच्चियों को सुरुआतसे ही अपने पति के साथ समझोता करने, पुरुष के ख़िलाफ़ आवाज़ न उठाने और अपना घर किसी भी तरह से बचाए रखने की सीख दी जाती है। साथ ही इन सब चीज़ों को त्याग, तपस्या और संयम एत्यादि के द्वारा महिमा मंडित भी करते रहे है । इसके साथ ही बच्चियों के मन में एक भय बिठाया जाता है की ऐसा नहीं करने पर उसे बहुत गम्भीर परिणाम ताउम्र भुगतना पड़ेगा।
वस्तुतः यह सारे रीति रिवाज पुरुषों के द्वारा अपने फ़ायदे के लिए बनाए गए है जिसके केंद्र में यह मानसिकता काम करती रही है की इस्त्रियाँ पुरुषों की इस्तेमाल की वस्तु है ।आज भी ऐसे लोगों की संख्या बहुतायत में है जो इसी मानसिकता में जीते है । स्त्री पुरुष की समानता की बातें चाहे हम कितनी ही कर ले पर जब समान अधिकार देने की बात आती है तब हम अलग अलग दलील देकर कन्नी काट जाते है । तीन तलाक़ बिल पास हो जाना निश्चय ही एक ऐतिहासिक फ़ैसला है और इस से लोगों के मन में अवश्य ही एक भय बनेगा, पर पुरुषों की शोषण की वृति इस से ख़त्म हो जाएगी ऐसा मैं क़तई नहीं मानता।
एक बात ज़रूर है की स्त्री पुरूष की समानता के लिए लड़ी जाने वाली लड़ाईं में अवश्य ही एक मील का पत्थर साबित होगा । इसके लिए उन तमाम संघर्षरत महिलाओं, स्वयं सेवी संस्थानो और प्रधान मंत्री श्री मोदी धन्यवाद और बढ़ायी के पात्र है ।

Naresh

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