Xiaomi Black Friday Sale dates

he sub-Rs 20,000 category keeps on seeing a host of new smartphones within a span of every few months. This month, the segment saw one of the most popular smartphone series get a new addition – Xiaomi’s Redmi Note series. The Redmi Note 8 Pro tries to redefine the ideal smartphone in this segment with class-leading features, competing with the Realme XT. Samsung also plays its card with the Galaxy A50s with new camera and improved design.

However, this segment currently has one phone that has a massive lead over others in terms of performance – Poco F1. Xiaomi’s flagship from 2018 is now starting at Rs 14,999, with a Snapdragon 845 chipset. Xiaomi also has another option in this segment in the form of the Redmi K20, which brings a dash of premium to this class. And we still have the Realme XT which is still the best all-rounder option you can buy for less than Rs 20,000.

चुनौतीपूर्ण काम करें

चुनौतीपूर्ण काम करें

यह हम सबों की आम मानसिकता होती है कि जीवन को और आराम दायक बनाया जाय, ज़्यादा से ज़्यादा आराम करें। इसी बात में ही जीवन के अधिकांश दुःख और समस्या भी छिपा हुआ है । चुनौती से भाग कर जितना ज़्यादा आराम की तरफ़ हम बढ़ते हैं हम अपने आपको कमज़ोर बनाते जाते है। जब हम अन्दर से आराम तलब और कमज़ोर हो जाते हैं तब जीवन में छोटी छोटी बातें हमें बहुत बड़ी और दुखदायी लगने लगती है।
कभी आपने ध्यान दिया है सभी लोग लगातार बारिश से बेहाल है, कौवा और दूसरे पंछी उसी बारिश में अपने भोजन की तलाश में इधर उधर नज़र दौरता रहता है उड़ रहा है। उसे ध्यान से देखने पर पायेंगेकी उसे इस लगातार बारिश से कोई गिला कोई शिकवा नहीं है बस अपने रोज़मर्रा के कामों में व्यस्त है। हम इंसान ही अपना ज़्यादा समय बस गिले शिकवे में ही बिता देते हैं और ख़ास कर उन चीज़ों पर जिन पर हमारा कोई बस नहींहोता है।
अतः मेरा मानना है कि रोज़ थोड़ा कठिन काम कीजिए। अपनी क्षमता से बस थोड़ा ही ज़्यादा।बहुत पहाड़ तोड़ने की अवस्यकता नहीं है बस अपनी क्षमता को थोड़ा थोड़ा बढ़ाइए तब आपको आपको जीवन में कठिनाइयाँ एक अवसर दिखने लगेंगी। जीवन में अपना नज़रिया थोड़ा बदलिए नज़ारे बदलने लगेंगे।
नवरात्रा पर सभी मित्रों को ढेर सारी बधाइयाँ और शुभ कामनाएँ।

निम्न कोटि के लोगों की वृद्धि दर

माल्थस ने कहा था “इन्सान अपनी जनन शक्ति से हमेशा परेशान रहेगा”, और उनकी यह बात हमेशा सच दिख रही है। पूरी दुनिया से जो आँकड़े आते हैं उस से यह बात स्पष्ट हो जाता है कि बुद्धिमान और विकसित लोग आबादी बढ़ाने में बिलकुल ही इक्षुक नहीं है ऐसे लोगों का पारिवारिक ढाँचा एकदम सीमित होता है पर निचले स्तर पर के लोगों का इस पर ना ही कोई नियंत्रण होता है और ना ही उनके पास सोच और साधन होते हैं जिस से कि परिवार को नियंत्रित रखा जाय। दूसरी बात कि उच्च कोटि के लोग उच्च कोटि के बच्चे पैदा करते है और निम्न कोटि के लोग निम्न कोटि के बच्चे पैदा करते है।यह एक औसत अकड़ा है पर अपवाद सभी जगह पाया जाता है। अब ज़रा ध्यान दीजिए कि इसका असर समाज पर किस प्रकार से पड़ता है? उच्च कोटि के लोग चूँकि काम बच्चे पैदा करते हैं अतः समाज में उच्च कोटि के नागरिक कम जुड़ते हैं। दूसरी तरफ़ निम्न कोटि के लोग अधिक बच्चे पैदा करते है अतः समाज में निम्न कोटि के बच्चे तेज़ी से अधिक संख्या में जुड़ते जाते हैं। आगे चलकर होता यह है कि समाज में निम्न कोटि के लोगों की संख्या बहुत बढ़ जाती है है और उच्च कोटि के लोगों की संख्या बहुत कम रह जाती है। ये निम्न कोटि के लोग बेहद आक्रामक और उदंड होते हैं जो किसी अनुशासन को नहीं मानते, सारी क़ायदे क़ानून को धता बताते हैं और समाज में एक अराजक स्थिति पैदा करते हैं। इस प्रकार के निम्न कोटि के लोग दूसरों के मान मर्यादा से कोई लेना देना नहीं होता है उलटे उनका अहंकार सातवें आसमान पे होता है।इसका नतीजा यह होता है कि ये उच्च कोटि के लोग डरे सहमे जीते हैं।

आज के रोज़मर्रा के हालात को देखने पर यह सब बातें अक्षरश रोज़ घटित होता हुआ दिख रहा है। और इस से भी बुरी बात जो भविष्य में होंगी वो यह कि उच्च कोटि के लोग इतने त्रस्त हो जायेंगे कि उन्हें अपनी पुरानी जगह छोड़कर भागने की भी नौबत आएगी। बहुतों को मेरी बात अतिशयोक्ति लग सकती है पर यह भी एक सच्चाई है जो गाहे बेगाहे अपने ही देश में देखने को मिलती ही रहती है । सच्चाई से आँखे चुराने वाला शतुर्मुर्ग बेशक बालू में अपनी मुंडी को छिपाकर आसन्न ख़तरों से अपने को बचा नहीं पता है बल्कि शिकारी का काम को और भी आसान कर देता है।

स्वर्गीय संजय गांधी ने जनसख्या नियंत्रण के लिए बेशक कड़े क़दम उठाये थे जो कि असफल ही गया था, मेरा मानना है कि उसे लागू करने के तरीक़े में ख़ामी थी। पर, इस बात में कोई शक की गुंजाइस नहीं है कि उनका सोच बहुत ही क्रांतिकारी और दूरदर्शी भरा था जो जनसंख्या के मामले में पूरी दुनिया में सम्मानजनक स्थिति में होता। अभी तो हमारा देश भी बच्चा पैदा करने में बांग्ला देश से बहुत ज़्यादा पीछे नहीं है ।

अभिभावक और बच्चों का परवरिश

बच्चे अपने अभिभावक के मान सम्मान को ताक में रख कर घर से भाग कर शादियाँ करे इस बात का मैं किसी भी प्रकार से समर्थन नहीं करता। पर, इस बात से इंकार तो नहीं किया जा सकता कि बच्चे को सही और ग़लत की समझ को सही तरीक़े से बच्चे में विकसित करने में अभिभावक के तरफ़ से चूक तो हुई ही है। अक्सर ऐसा होता है कि अभिभावक बच्चों को खान पान, पढ़ाई लिखाई और सारी ज़रूरतों को तो बहुत बेहतर तरीक़े से पूरा करते हैं पर भावनात्मक रूप से एक दूरी बन जाती है जो बाहर से दिखाई नहीं देता, बाहर से सबकुछ सामान्य दिखता है। ऐसी भावात्मक अकेलापन में बच्चे इस प्रकार की नासमझी भरी ग़लतियाँ कर जाते है जिसका ख़ामियाज़ा बहुत बार ताउम्र भुगतना पड़ता है। कई बार उनकी इस प्रकार की शादियाँ सफल भी होती है।

मेरा मानना बिलकुल साफ़ है की बच्चे को इतना परिपक्व बनाएँ कि उनके निर्णय पर आपको फ़ख़्र महसूस हो। वर्ना उनकी ग़लतियों का ख़ामियाज़ा आपको और आपके बच्चों दोनो को झेलना पड़ेगा। यह भी सच है की बच्चों की ख़ुशी सबसे बड़ी ख़ुशी होती है और बच्चों की पीड़ा सबसे बड़ी पीड़ा होती है।

औरतों के प्रति क़बिलाई सोच

हमारा आज का आधुनिक समाज सैकड़ों साल पहले क़बिलाई समाज हुआ करता था। इन कबिलाओं में अक्सर लड़ाइयाँ हुआ करती थी और जितने वाले हारने वाले कबिलाओं के सम्पत्तियों, मवेशियों और औरतों को छीन कर अपने कबीला में ले जाते थे। इसके वजह से उस ज़माने में जब किसी परिवार में लड़की पैदा होती थी तब लोग दुखी होते थे और लड़के पैदा होने पर उत्सव मनाया जाता था क्योंकि इससे कबीला मज़बूत होता था। और, उसी समय से औरतों को एक इन्सान के बजाय एक वस्तु या सम्पत्ति के रूप में देखने की मानसिकता विकसित हुई।
आज हमारा समाज बहुत विकसित हो गया है बावजूद इसके आज भी बहुत सारे पुरुष उसी क़बीलाई मानसिकता को छोड़ नहीं पाये है। अब ज़रा सोचिए कि एक राजा सैकड़ों की टायदाद में रानियाँ या बेगम रखता है जो इस बात को बताता है कि उस इंसान के लिए औरतें वस्तु या सम्पत्ति से ज़्यादा कुछ नहीं है। जिस प्रकार से एक धनवान बहुत सारी महँगी गाड़ियाँ रखता है वैसे ही बहुत सारी बेगमें भी रखता है। कमोबेश आज भी पुरुष मानसिकता इस सोच से मुक्त नहीं हुआ है।

अब इसका कैसे कैसे क्या असर होता है उसे देखिए। एक लड़का और एक लड़की दोनो अलग अलग समाज के हैं वो प्रेम विवाह करते हैं। तब वह समाज जहाँ से लड़की आयी है वह अपमानित महसूस करता है और लड़के का समाज गौरव का अनुभव करता है। मतलब साफ़ है की लड़की ना हुई कोई वस्तु हो गयी कोई ट्राफ़ी हो गयी जिसे एक लड़के वाले ने जीत कर लाया है। यहाँ पर लड़की की अपनी इक्छा और अनिछा का कोई बहुत मायने नहीं रखा जाता है क्योंकि वह तो वस्तु है उसकी हैसियत एक पुरुष के बराबर हो कैसे सकती है? वह अपना अच्छा बुरा कैसे सोच सकती है यह पुरुष मानसिकता को हज़म ही नहीं होता है ।

इसमें कोई शक नहीं है कि आज सभी समझदार अभिभावक अपनेबच्चियों के पढ़ाई लिखाई में कोई कोर कसर नहीं छोड़ते है । और, ऐसे लोगों की भी संख्या अच्छी ख़ासी है जो यह सोच कर बच्चियों की को पढ़ाई लिखाई नहीं करवाते हैं क्यों कि बच्ची ज़्यादा पढ़ लिख जाएगी तब उसके लायक लड़के से शादी करने में बहुत ज़्यादा दहेज देना पड़ेगा जितनी हैसियत उनके पास नहीं है ।

लाटरी ख़रीदने की मानसिकता

एक युवक नियमित रूप से लाटरी की टिकट ख़रीदता है, इस आशा में कि एक ना एक दिन उसका भाग्य पलटी खायगा और उसे एक बड़ी लाटरी लगेगी और उसके सारे अभाव दूर हो जायेंगे उसकी ज़िन्दगी ख़ुशियों से भर जाएगी। मैंने देखा है कि ऐसे लोगों की पूरी ज़िन्दगी इसी आस में और अभाव में ही गुज़र जाता है।और मौक़े बेमौके कोई छोटी लाटरी लग भी जाती है तो वह पैसा उन्ही लाटरी या और फिर अन्य अनावश्यक चीज़ों में ख़र्च हो जाता है और ले देकर परिस्थिति वैसी है या फिर और ख़राब होती चली जाती है। सबसे बड़ा नुक़सान यह होता है कि उसकी समझदारी से काम करके धन को अर्जन करने की वृत्ति मर जाती है। वह हमेशा से कहीं से धन मिल जाएगा ऐसी मानसिकता का आदी हो जाता है। मेहनत करने के बजाय कहीं से धन मिल जाएगा यह सोच बन जाना सबसे बड़ा नुक़सान होता है जो उसके अन्दर के पुरुषार्थ को नष्ट कर देता है।

एक युवक जो सही तरीक़े से परिपक्व नहीं हुआ है उसे अपने ज़मीन जायदाद के बिक्री से 70-80 लाख रुपये मिल जाते है वह उन पैसों से तमाम तरह को दुनिया में आराम और शानो शौक़त की चीज़ों की ख़रीदारी में लगा देता है और पैसे के ग़ुरूर में कई ऐसे काम कर लेता है जिसके वजह से कई प्रकार के पचड़ों में उलझ जाता है।मुश्किल से 5-7 साल के अन्दर में उसका सारा पैसा ख़र्च हो जाता है और कई प्रकार की समस्या में बुरी तरह से उलझ कर अपने लिये ख़ास समस्या खड़ी कर लेता है। इसमें ध्यान देने वाली बात यह है की जब आप सही तरीक़े से पैसे की आमदनी करके सम्पत्ति बनाते हैं तब आपके अन्दर उस सम्पत्ति को सम्भालने की परिपक्वता और शक्ति भी विकसित होती जाती है। यदि धन, अन्यानय तरीक़े से आपके पास एकाएक आ जाय तब यह आपके दिमाग़ को एकाएक अहंकार से भर देगा, परिपक्वता के अभाव और अहंकार में आप एक एक करके ग़लत क़दम उठाते जायेंगे और फँसते जायेंगे। अंततः अचानक आया हुआ धन तो जायेगा ही आप अपने लिये नयी मुसीबत खड़ी कर लेंगे सो अलग। जब एक परिपक्व इन्सान के पास धन आता है तब उसके जीवन में सुख और समृद्धि आती है। एक अपरिपक्व इंसान के हाथ में धन आता है तब उसके साथ जीवन में नाना मुसीबतें भी आ जाती है। एक अनुमान बताता है की पूरी दुनिया में 95% धन मात्र 5% लोगों के पास ही है। दूसरी बात कि यदि पूरी सम्पत्ति सभी लोगों के पास बराबर बराबर बाँट दिया जाय तो क्या होगा? आप जानकर हैरान हो जायेंगे कि मुश्किल से 5-8साल के अन्दर फिर 95% धन उन्ही 5% लोगों के पास वापस आ जायेगा।

आपका यक़ीन ही आपका यथार्थ है ।

ज़िन्दगी किसी के रोके नहीं रूकती है बस चलती जाती है बहती जाती है नदी के धारा के समान। कभी रुलाती है कभी हँसाती है और सब से बड़ी बात रोज़ रोज़ कुछ ना कुछ सिखाती है। ये अलग बात है सिखने के लिये हमने अपना दिमाग़ कितना खुला रखा है ? बहुत सारे लोग इस मुग़ालते में जीते हैं कि हमने इतने वसंत पार कर लिया हूँ अब मुझे कुछ नया जानने और सीखने की ज़रूरत ही क्या है? मैं तो स्पष्ट रूप से मानता हूँ नये चीज़ों को जानने और सीखने की चाहत जब भी ख़त्म हो जाय समझ लीजिये कि इन्सान बूढ़ा हो गयाल बेशक उस वक़्त उसकी उम्र 30 40 50 के आसपास ही क्यों नाहो । किसी की उम्र 70 के पास ही क्यों ना हो यदि आज भी सीखने की ललक बनी हुई है तो वो शक्स आज भी युवा ही है। बुढ़ापा और यौवन हमारे मन के अन्दर की मान्यता है । हमारा यक़ीन ही हमारा यथार्थ बन जाता है ।पूरी बातों का निचोड़ यही है कि जीवन के प्रति उत्साह और ललक बनी हुई है तब तक आप युवा ही है। इसीलिये मैं तो मानता हूँ कि अवकाश के बाद भी कुछ नया चीज़ सीखिये, बस अपने मन की ख़ुशी के लिये मन के सुकून के लिये। पैसे और प्रमोशन के लिये तो अबतक बहुत कुछ किये, अब थोड़ा अपने मन का कीजिये हुज़ूर ।

भारत की क़ानून व्यवस्था

कितना घोर अन्याय है एक लड़की के साथ ज़ुल्म हो जाता है, पुलिस FIR नहीं लेती । उलटे उसके पिता को केस ना करने के लिए मारपीटा जाता है और अत्याचार की ऐंतहा तब हो जाती है जब उसकी मौत हो जाती है तब कहीं जाकर प्रशासन की नींद खुलती है तब SIT का गठन होता हैं FIR दर्ज होता है तब मुख्य अभियुक्त को छोड़ कर दूसरे अभयुक्तों को गिरफ़्तार किया जाता है। सच में ग़रीबों और कमज़ोरों के लिए न्याय पाने के लिए कितने ज़ुल्म और सितम सहने परते हैं। जान भी चली जाती है और ताउम्र एक डर के ख़ौफ़नाक साये में जीना कितना दर्दनाक है इसका सहज ही अंदाज़ा लगाया जा सकता है। और उसपर तुर्रा ये की अभियुक्त हँसते हुए बेशर्मी की हद पार करते हुए मीडिया को इंटर्व्यू देता है जैसे कह रहा हो सारा देश मेरे ठेंगे पर है जिसे जो बन पढ़ता है वो कर ले। मैं तो ऐसा ही हूँ और ऐसा ही रहूँगा ।
और उसपर कुछ क़ानून के जानकार यह दलील देते हैं की कितने भी अपराधी छूट जायें पर एक निर्दोष को सज़ा नहीं होनी चाहिये। और, इसी तर्क के बहाने सालों साल, सालों साल क़ानूनी प्रक्रिया चलती रहती है। अपराधी ठोस साक्ष्य के अभाव मैं बरी हो जाता है या बेल पर बेल पाकर उस भक्त भोगी के जीवन को और नारकीय बना देता है। इसकी परिणती बहुतों बार भुक्तभोगी की आत्महत्या या हत्या के रूप मैं भी होती हैं। सच में देश की क़ानूनी प्रकिया को देखकर बड़ा कोफ़्त होता है और एक बहुत बड़ी बेवसी पूरे देश में छा जाती है। अपराधियों की जल्दी धर पकड़ ना हो पाना और सज़ा के लिए २०-२५ साल का समय लगना और उसके बाद भी अंतिम मुहर का न लगना लोगों के मन मैं क़ानून के सम्मान में बहुत कमी लाता है । और इसका नतीजा ये होता है की फिर सैकड़ों की संख्या में क़ानून को तोड़ने वाले पैदा होते जाते हैं और क़ानून की इज़्ज़त करने वालों को बे इज़्ज़त करने लागतें हैं। मैं अपने आपको एक अन्धेर नगरी की एक अन्धेरी गुफा में फँसा हुआ महसूस करता हूँ और आशा की किरण के लिये बुरी तरह से छटपटा हुआ महसूस करता हूँ , क्या हमारे और भी भारत वासी मेरी तरह हीं छटपटा रहें हैं?
नरेश

वही करो जो मन को शकुन दे

किसी को ख़ुश करने के लिये काम मत करो
किसी को दुखी करने के लिए काम मत करो
काम बस वही करो जो सत्य और सुंदर हो और आपके दिल को सुकून दे ।
बस अपनी मौज में काम करो, अपनी मौज में जियो।

ज़िंदगी के किताब से

दूसरों को सुधारने की चाहत

इंसान अपनी निजी ज़िन्दगी में हमेशा इक अच्छे और ईमानदार मित्र की चाहत रखता है और जाने अनजाने में इसकी तलाश भी करता रहता। इसलिये इसे मैं इंसान की सहज चाहत और व्यवहार मानता हूँ। पर इसके साथ एक सर्वमान्य व्यवहार यह भी देखा जाता है की हम प्रायः इस बात के लिये जनमत नहीं उठाते की हम कितने सच्चे और अच्छे इंसान है ? इस बात में कोई बुराई नहीं है की हम सच्चे और अच्छे मित्र चाहते है पर क्या हमें इस बात की की तसल्ली नहीं करनी चाहिये की हमें भी सच्चा और ईमानदार होना चाहिए?

हमारी प्रत्यशा सिर्फ़ दूसरों से रहती है की लोगों को ऐसा रहना चाहिए, लोगों को वैसा करना चाहिये लोगों को ऐसा नहीं करना चाहिये। इस बात को हम दूसरे तरीक़े से कह सकते है की लोग ज़्यादातर दूसरों को सुधारना चाहते है, अपने में सुधार करना नहीं चाहते क्योंकि अक्सर उन्हें यह लगता है की मैं तो ठीक हूँ सब गड़बड़ी दूसरों के वजह से हो रही है, इसलिए दूसरो को सुधारना चाहिए और इसके लिए कई प्रकार का प्रयास भी लोग करते है। और इसी वह से सारा संघर्ष और वैमनस्य चारों तरफ़ फैलता है और संघर्ष पैदा होता है ।